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अति-गरीबी से मुक्ति का रास्ता


अरुण कुमार, अर्थशास्त्री Updated: Wed, 30 Jan 2019 10:10 PM IST

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यूनीवर्सल बेसिक इनकम, यानी सरकार द्वारा सबके लिए नियमित रूप से एक निश्चित आमदनी देने की योजना की चर्चा भारत के लिए नई नहीं है। तीन साल पहले सरकार ने अपने सलाना आर्थिक सर्वेक्षण में इसका जिक्र किया था। अब राहुल गांधी ने इसका वादा करके इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है। वैसे काफी समय से कहा जा रहा था कि सरकार जल्द ही इसकी घोषणा करने जा रही है, इसके पहले कि सरकार कुछ करती, राहुल गांधी ने इसकी राजनीतिक पहल अपने हाथों में लेने की कोशिश की है। हालांकि राहुल गांधी ने भी इसका कोई ब्योरा नहीं दिया है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि इस योजना की रूपरेखा क्या होगी?

जब हम यूनीवर्सल बेसिक इनकम या यूबीआई की बात करते हैं, तो इसका मतलब होता है- सबको नियमित रूप से एक निश्चित आमदनी देना। इस सबको में कोई अपवाद नहीं होता, यानी जितना धन किसी फुटपाथ पर सोने वाले को दिया जाएगा, उतना ही मुकेश अंबानी को भी मिलेगा। अगर हम सचमुच इस रूप को अपनाते हैं, तो हमारे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पर चार से पांच फीसदी तक का असर पडे़गा। लेकिन अभी जो चर्चा है, उससे यही लगता है कि भारत में यह रास्ता शायद न अपनाया जाए। इसे सिर्फ गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों तक ही सीमित रखा जाए। ताजा आंकडे़ बता रहे हैं कि देश में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या लगभग 22 फीसदी है। अगर देश की 20 फीसदी आबादी को यह रकम दी जाए, तो इसका जीडीपी पर एक फीसदी असर पड़ेगा। जाहिर है कि अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत ज्यादा असर नहीं पडे़गा। इस लिहाज से यह गरीबों के लिए यूबीआई होगी।

निस्संदेह, इसमें कई दिक्कतें भी आएंगी। दरअसल, जब कोई योजना सबके लिए होती है, तो उसमें किसी को छांटने, चुनने या पहचानने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर योजना सबके लिए नहीं होती, तो उन लोगों को पहचानना जरूरी होता है, जिन तक वह लाभ पहुंचाया जाना है। यह काफी कठिन काम हो जाता है। हालांकि इसका भी एक तरीका है, और इसमें सोशल इकोनॉमिक सर्वे से पर्याप्त मदद मिल सकती है।  यहां पर यह सवाल जरूर उठेगा कि इतने संसाधन आएंगे कहां से? देश में वैसे तो संसाधनों की कोई कमी नहीं है। इसलिए डेढ़ से दो फीसदी अतिरिक्त संसाधन जुटाने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। अभी पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में आर्थिक विषमता बहुत तेजी से बढ़ी है। यहां ऊपर के एक फीसदी लोगों के पास देश की 73 फीसदी संपत्ति है। ऐसे में, संपत्ति कर लगाया जा सकता है। गरीबी सेस की शुरुआत की जा सकती है। इच्छाशक्ति हो, तो फिर अतिरिक्त संसाधन जुटाने के ऐसे बहुत से तरीके हैं। वित्तीय घाटा बढ़ाया जा सकता है। सरकार अभी इसे तीन फीसदी के आसपास रखने की कोशिश करती है। तीन फीसदी कोई ऐसा मानक नहीं है, जिसे अपनाया जाना बहुत जरूरी हो। इसे आराम से चार या साढ़े चार फीसदी तक ले जाया जा सकता है। इससे कोई बहुत बड़ी दिक्कत आने वाली नहीं है।

ऐसी योजना को लागू करने का यह सबसे उपयुक्त समय है। इस समय हम महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहे हैं। गांधीजी हमेशा यह कहते थे कि पंक्ति में जो अंतिम आदमी है, उस पर ध्यान दिया जाए। उस पर ध्यान देने का यह एक सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। अभी जो आदमी पंक्ति में आखिरी पायदान पर है, उसके लिए शिक्षा का अभाव है, न उसे स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती हैं, न साफ पानी, न साफ हवा। अगर उसे इन अमानवीय स्थितियों से उबारना है, तो हमें इसी तरह की किसी योजना की जरूरत होगी। अभी तक हम ट्रिकल डाउन सिद्धांत से उम्मीद बांधते रहे हैं। यह मानते रहे हैं कि अगर ऊपर विकास तेज होगा, तो धन धीरे-धीरे नीचे गरीब तक भी पहुंचेगा। लेकिन ऐसा हुआ कभी नहीं। अब यही तरीका बचा है कि जो नीचे हैं, सीधे उन तक धन पहुंचाया जाए, बिना अर्थव्यवस्था के विकास से कोई उम्मीद बांधे। 

इसका अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा असर पड़ेगा। आखिर गरीब को जब पैसा मिलेगा, तो वह क्या करेगा? वह भोजन खरीदेगा, चप्पल खरीदेगा, बच्चों के जूते खरीदेगा, कपड़े खरीदेगा, अपने बच्चों को स्कूल भेजेगा। इससे उसकी भी तरक्की होगी। लेकिन इससे बड़ा फर्क अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, बाजार में इन सामानों की मांग बढे़गी, तो उसके लिए उत्पादन भी होगा, जिसके लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। 

इससे गरीबी पूरी तरह खत्म हो जाएगी, यह नहीं कहा जा सकता। हां, यह जरूर होगा कि जो अभी तक अति-गरीब हैं, वे अति-गरीब नहीं रहेंगे। वे गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएंगे, यानी इससे गरीबी की रूपरेखा बदलेगी। यहां पर योजना के प्रावधानों पर ध्यान रखना जरूरी है कि जो गरीबी की रेखा से ऊपर आ गए हैं, कहीं उनको धन मिलना बंद न हो जाए। ऐसा हुआ, तो बहुत से लोग वापस अति-गरीबी में पहुंच जाएंगे।

इस योजना के कुछ प्रभाव नकारात्मक भी हो सकते हैं, हालांकि इसके मुकाबले सकारात्मक प्रभाव बहुत ज्यादा होंगे। इसमें हम खोएंगे तो बहुत कम, लेकिन हासिल बहुत कुछ करेंगे। इस योजना को लागू करने में और कोई बाधा नहीं है, बस सबसे ज्यादा बाधा राजनीतिक इच्छाशक्ति की आएगी। इच्छाशक्ति  हुई, तो देश की अति-गरीबी से हम जल्दी ही मुक्ति पा लेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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