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देश के तमाम राज्यों ने किसानों के ऋ ण माफ किए हैं और इस चुनाव में भी ऋ ण माफी के वायदे किए गए हैं

 

देश के तमाम राज्यों ने किसानों के ऋ ण माफ किए हैं और इस चुनाव में भी ऋ ण माफी के वायदे किए गए हैं

Reported by: डॉ. भरत झुनझुनवाला 2018-12-20 0

 देश के तमाम राज्यों ने किसानों के ऋ ण माफ किए हैं और इस चुनाव में भी ऋ ण माफी के वायदे किए गए हैं। लेकिन यह भी सफल नहीं होगा जैसे घाटे में चल रही कम्पनी के ऋण मा$फ कर दिए जाए तो शीघ्र की दोबारा घटा लगेगा और पुन: कंपनी ऋण में डूब जायेगी। अथवा परिवार की आय कम हो तो पुस्तैनी जेवर को बेचने से अधिक समय तक जीवित नहीं रहा जा सकता है। साथ साथ ऋण मा$फी से राज्य सरकारों के बजट पर भरी वजन पड़ रहा है और राज्य सरकारें जरूरी विकास कार्य नहीं कर पा रही हैं जैसे सड़क आदि का बनाना। इस प्रकार वर्तमान में लागू तीनों हल यानि समर्थन मूल्यों की वृद्धि, निर्यात अथवा ऋण मा$फी से किसानों कि समस्या हल नही हो रही है। हमें नई सोच की जरूरत है।

आम चुनाव के सेमीफाइनल में किसान का मुद्दा छाया रहा है। केन्द्र सरकार ने कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य में वृद्धि करके किसान का हित साधने का प्रयास किया था। लेकिन यह नीति सफल नहीं हुई है। इसके दो कारण हैं। मुख्य कारण यह है कि समर्थन मूल्य बढ़ाने से किसान द्वारा फसलों का उत्पादन अधिक किया जा रहा है जबकि देश में खपत कम है। इस कारण फसल के दाम गिर रहे हैं और किसान घाटा खा रहा है। जैसे चीनी का उत्पादन अधिक होने एवम् खपत कम होने से चीनी का भण्डारण बढ़ता जा रहा है और दाम गिर हुए हैं। इस प्रकार समर्थन मूल्य बढ़ाने से समस्या का हल नहीं होता है।

    दूसरा हल यह दिया जा रहा है कि बढ़े हुए उत्पादन का निर्यात कर दिया जाए। यहाँ समस्या यह है कि अधिकतर कृषि उत्पादों के विश्व बाजार में दाम कम हैं और अपने देश में अधिक। जैसे स्किम्ड मिल्क पावडर का विश्व बाजार में दाम 134 रुपया प्रति किलो है जबकि भारत में इसकी उत्पादन लागत 180 रुपए प्रति किलो है। ऐसे में यदि हमें स्किम्ड मिल्क पावडर का निर्यात करना है तो सरकार को 50 रुपया प्रति किलो कि सब्सिडी देनी होगी जो कि सरकारी बजट पर भारी पड़ेगा। यह नीति संभव नहीं है। साथ साथ उत्पादन बढ़कर निर्यात सब्सीडी देने से हमारे पर्यावरण की हानि होती है। जैसे हमने चीनी का उत्पादन अधिक किया। हमने अपने पानी का अति दोहन किया। भूमिगत पानी नीचे गिर गया। भूमि कि उर्वराशक्ति कम हो गई। किसान ने मेहनत कि और लाभ उस विदेशी उपभोक्ता का हुआ जिसको हमने सब्सिडी देकर सस्ती चीनी उपलब्ध कराई। इसलिए निर्यात कि रणनीति सफल नहीं हो सकती है। 

समस्या का तीसरा उपाय ऋण मा$फी किया जाना है। देश के तमाम राज्यों ने किसानों के ऋ ण माफ किए हैं और इस चुनाव में भी ऋ ण माफी के वायदे किए गए हैं। लेकिन यह भी सफल नहीं होगा जैसे घाटे में चल रही कम्पनी के ऋण मा$फ कर दिए जाए तो शीघ्र की दोबारा घटा लगेगा और पुन: कंपनी ऋण में डूब जायेगी। अथवा परिवार की आय कम हो तो पुस्तैनी जेवर को बेचने से अधिक समय तक जीवित नहीं रहा जा सकता है। साथ साथ ऋण मा$फी से राज्य सरकारों के बजट पर भरी वजन पड़ रहा है और राज्य सरकारें जरूरी विकास कार्य नहीं कर पा रही हैं जैसे सड़क आदि का बनाना। इस प्रकार वर्तमान में लागू तीनों हल यानि समर्थन मूल्यों की वृद्धि, निर्यात अथवा ऋण मा$फी से किसानों कि समस्या हल नही हो रही है। हमें नई सोच की जरूरत है।

    एक हल यह हो सकता है कि हम गेंहू और चीनी जैसे न्यूनतम कीमत के कृषि उत्पादों के स्थान पर उच्च कीमत के कृषि उत्पादों की तरफ बढ़ें। आज फ्रांस में अंगूर कि खेती करके शराब बनाई जा रही है। नीदरलैंड में ट्यूलिप फूलों कि खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है और सम्पूर्ण विश्व को वह देश ट्यूलिप के फूल उपलब्ध करा रहा है। अफ्रीका के छोटे से देश ट्यूनिसिया में जैतून के फलों की भारी खेती हो रही है। जापान में विशेष आकार के तरबूजों का उत्पादन किया जा रहा है। तरबूज के छोटे फल को एक विशेष आकर जैसे चौकोर डिब्बे में डाल दिया जाता है जिससे बड़ा होने पर चौकोर आकार का बनता है। अमरीका में जीन परिवर्तन तकनीक के माध्यम से टमाटर के फल पर किसी कम्पनी के लोगों को डाला जा रहा है। उन पोधों के हर फल के उपर उस कम्पनी का लोगों स्वयं लगा हुआ हमें मिलता है। इस प्रकार के उच्च मूल्य के उत्पादों में किसान को भारी आय हो सकती है। फ्रांस और नीदरलैंड के किसान अपने कर्मियों को आज प्रति दिन सात हजार रुपए का वेतन दे रहे हैं चूँकि अंगूर और ट्यूलिप से इन्हें भारी आय हो रही है। 

भारत के पास हर प्रकार की जलवायु उपलब्ध है। हिमालय से लेकर यदि हम डेकन के पठार और केरल तक पहुंचें तो गर्म, सर्द, नम और सूखे हर प्रकार की जलवायु हमारे यहां उपलब्ध है और हम अंगूर, ट्यूलिप, जैतून, तरबूज और टमाटर सभी कि खेती आसानी से कर सकते हैं। हमें अपने किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्पादन की मात्रा बढ़ाने के स्थान पर इन उच्च मूल्य के उत्पादों कि तरफ ले जाना होगा। इसके लिए सरकार को कदम उठने होंगे। इंडियन काउन्सिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च की शोध सस्थाओं को सही करना होगा। सरकारी वैज्ञानिक मुख्यत: कुर्सी पर बैठकर आराम करते हैं। इन संस्थाओं में स्वयं शोध करने को अधिक महत्व न देकर इनके द्वारा निजी युनिवर्सिटियों को शोध करने के ठेके दिए जाने चाहियें जिससे कि वास्तविक शोध हो और भारत में फ्रांस के अंगूर जैसा उत्पादन हो सके। 

साथ साथ सरकार को इन कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए बुनियादी संरचना स्थापित करनी होगी। जैसे ट्यूलिप का फूल निर्यात करने के लिए नीदरलैंड के अमस्टरडाम हवाई अड्डे विशेष हंगेर बने हैं जहाँ पर वातानुकूलित वातावरण में इन फूलों को रखा जाता है और यहां से इनका निर्यात हो सकता है। यदि आज हिमाचल के सोलन में ट्यूलिप फूलों कि खेती हो तो उनको हवाईअड्डे पर लाकर विश्व के बाजार में पहुचाना संभव नहीं है चूँकि हमारे हवाई अड्डों में इस प्रकार के वातानुकूलित हैंगरों की वयस्था नहीं है। 

    दूसरा उपाय यह है कि हम किसान को उत्पादन के अधिक मूल्य देने के स्थान पर वही रकम सीधे रकम सीधे उसके खाते में ट्रान्सफर कर दें। अमरीका ने इस रणनीति को बखूबी अपनाया है। अमरीका के किसानों को भूमि पर खेती न करने के लिए सब्सिडी दी जाती है। अगर कोई किसान अपनी भूमि को पडती छोड़ देता है तो रकम उसके खाते में डाल दी जाती है। अमरीका की सरकार समझती है कि यदि उत्पादन बढ़ेगा तो बाजार में सप्लाई बढ़ेगी और फसल के दाम घट जायेंगे। जैसे अमरीका में मक्के का भारी मात्रा में उत्पादन होता है। मक्के का उत्पादन बढ़ा तो दाम गिर जायेंगे और किसान को घाटा होगा। उस घाटे की भरपाई करने के लिए अमरीका की सरकार यदि मक्के का समर्थन मूल्य बढ़ा दे तो उत्पादन बढ़ता जायेगा और उस उत्पादन को निर्यात करने के लिए सरकार को पुन: सब्सीडी देनी पड़ेगी। इसलिए अमरीका की सरकार ने निर्णय लिया कि मक्के का उत्पादन ही कम कर दो और किसान को एक रकम जमीन पर खेती न करने के लिए देने लगे। ऐसा करने से किसान को सीधे राहत मिली। उसकी जो उर्जा मक्के की व्यर्थ खेती करने के लिए व्यय होती थी उस उर्जा का उपयोग वह दूसरे कार्यों में कर रहा है। 

वर्तमान में आने वाले चुनाव में किसान का मुद्दा हावी रहेगा। सभी पार्टियों को वर्तमान समर्थन मूल्य, निर्यात एवम् ऋण मा$फी की नीति को त्याग कर उच्च मूल्य के उत्पादन एवम् किसान को सीधे सब्सीडी देने कि नीति को लागू करना चाहिए।www.deshbandhu.co.in

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