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आदिवासी पोस्ट ग्रेजुएट, फिर भी जंगल में बीन रहे हैं महुआ




आदिवासी पोस्ट ग्रेजुएट, फिर भी जंगल में बीन रहे हैं महुआ

Dainik Bhaskar

Apr 30, 2015, 01:41 PM IST

सहरिया बहुल श्योपुर जिले में सरकार की नीति धरातल पर नहीं उतर सकी है। यहां एमए पास सहरिया न सिर्फ बेरोजगार हैं बल्कि रोजी-रोटी के लिए जंगल में महुआ बीन रहे हैं।

ग्वालियर। मप्र सरकार ने सहरिया, बैगा और भारिया जाति को विशेष पिछड़ी जनजाति में शुमार किया है। इन जातियों के 12वीं तक शिक्षित युवक-युवतियों को सीधी भर्ती के जरिए सरकारी नौकरी देने की नीति भी राज्य में लागू है। लेकिन सहरिया बहुल श्योपुर जिले में सरकार की नीति धरातल पर नहीं उतर सकी है। यहां एमए पास सहरिया न सिर्फ बेरोजगार हैं बल्कि रोजी-रोटी के लिए जंगल में महुआ बीन रहे हैं।बीते माह से यह त्रासदी इसलिए भी बढ़ गई है कि सहरिया जनजाति के लोगों को पढ़ाने के लिए रखे गए 40 भाषाई शिक्षकों को भी हटा दिया गया है। इसके साथ ही सहरिया समन्वय केंद्र में पहले से ही करीब डेढ़ हजार शिक्षित सहरिया युवक पंजीकृत हैं और नौकरी के इंतजार में हैं।रानीपुरा के राजू आदिवासी (28) की शादी पनवाड़ा की आदिवासी लड़की से हुई है। राजू का ससुर शिक्षक है। राजू से उसने अपनी बेटी की शादी इसलिए की थी कि राजू ने श्योपुर के पीजी कॉलेज से हिंदी साहित्य में एमए किया है। वह आदिम जाति कल्याण विभाग के अधीन सहरिया की परंपरागत भाषा में समाज के अनपढ़ लोगों को पढ़ाने के लिए बतौर भाषाई शिक्षक पांच हजार की पगार पर काम करता था। लेकिन गुजरे आठ माह से वह बेरोजगार है। अब वह ससुराल रानीपुरा में रहता है और अपना व पत्नी, बच्चों का पेट पालने के लिए मजदूरी कर रहा है। दरअसल आदिम जाति कल्याण विभाग ने जिले के सभी 40 भाषाई शिक्षकों को हटा दिया है।पढ़ा लिखा फिर भी बेरोजगारप्रदेश सरकार ने किसी भी विभाग में एमए राजू को नौकरी नहीं दी। 2013-14 में राजू ने मुरैना स्थित सरकारी डीएड कॉलेज से डीएड का डिप्लोमा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया है। लेकिन फिर भी राजू न तो शिक्षक बन सका है और न ही उसे किसी और काम में जोड़ा गया है। अब बेरोजगारी राजू की मजबूरी बन गई है। उसे पेट पालने के लिए जंगल में महुआ बीनने के साथ ही मजबूरन बड़े काश्तकारों के खेतों में मजदूरी भी करनी पड़ रही है।ग्राम बांकुरी निवासी 25 साल के रामदयाल आदिवासी को भी शिक्षा का फायदा नहीं मिला। नौकरी का प्रावधान होने के बाद भी रामदयाल को किसी विभाग ने नौकरी पर नहीं रखा। जबकि रामदयाल संविदा शिक्षक से लेकर पटवारी तक के लिए आवेदन भर चुका है। बकौल रामदयाल अभी वह पिता के साथ खेतीबाड़ी करता है। शेष समय में दूसरे किसानों के खेतों पर मजदूरी करता है।सहरिया जनजाति को सीधे नौकरी की पात्रता होने के बावजूद भी उनके सरकारी दफ्तरों में घुसने पर ही अघोषित पाबंदी है। अचंभा है कि जिला सहरिया समन्वय केंद्र में गुजरे तीन साल से डेढ़ हजार से अधिक पढ़े-लिखे युवक पंजीकृत हैं। सहरिया विकास विभाग और जिला प्रशासन मिलकर इनमें से 10 को भी नौकरी नहीं दे पाया है।2008 में किया था मप्र सरकार ने गजट नोटिफिकेशनसहरिया, बैगा और भारिया जनजाति के युवक-युवतियों को सीधी भर्ती के जरिए नौकरी देने का नियम लागू करने के लिए मप्र सरकार ने वर्ष 2008 में गजट में प्रकाशन किया था। इसके बाद जिला कलेक्टर्स को कई दफा सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से सरकूलर से भी कई सरकूलर जारी किए गए। लेकिन जिले में इसका लाभ सहरिया शिक्षित युवाओं को नहीं मिला है।सरकारी नौकरी देने की बजाय सिक्यूरिटी गार्ड बनाने में रुचिआदिम जाति कल्याण विभाग ने करीब तीन साल पहले सहरिया समन्वय केंद्र सहायकआयुक्त अजाक कार्यालय में स्थापित किया था। इसमें करीब 3 हजार सहरिया युवकों ने पंजीयन किया था। पूर्व कलेक्टर जी पाटिल के समय में इस केंद्र के जरिए आठ युवकों को लोनिवि में कलेक्टर दर पर नौकरी दी गई थी। इसके अलावा कुछ को निजी कंपनियों में नौकरी पर भेजा गया। लेकिन तीन साल में परमानमेंट नौकरी पर किसी को नहीं रखा गया। निवर्तमान कलेक्टर ज्ञानेश्वर पाटिल ने सहरिया युवकों को ग्वालियर टेकनपुर स्थित बीएसएफ अकादमी से ट्रेनिंग दिलाकर बैंकों में सिक्यूरिटी गार्ड के पद पर नौकरी दिलाने में जरूर रुचि दिखाई थी

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