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आधी-अधूरी कर्जमाफी


आधी-अधूरी कर्जमाफी

वी एम सिंह Updated Fri, 21 Dec 2018 06:37 PM IST

किसानहिंदी पट्टी के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पहले ही राजनीतिक दलों को स्पष्ट रूप से चेतावनी दे दी है कि या तो वे अपने चुनावी वायदे पूरे करें, अन्यथा उन्हें सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। अब किसानों को जाति के आधार पर वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। किसानों ने साढ़े चार वर्षों तक प्रधानमंत्री मोदी का इंतजार किया कि वे कर्जमाफी का अपना चुनावी वायदा पूरा करें और स्वामीनाथन रिपोर्ट के अनुसार फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करें, लेकिन ऐसा नहीं होने पर उन्होंने अपना गुस्सा दिखाया, नतीजतन इन राज्यों में भाजपा की हार हुई। देश के 209 कृषि संगठनों से मिलकर बनी अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के देशव्यापी संघर्ष के केंद्र में यही दो मुख्य मांगें हैं। एआईकेएससीसी ने इन मांगों को दो प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में तैयार किया, जो इसके सदस्यों द्वारा संसद में पेश किया गया। किसान आंदोलनों की मनोदशा भांपकर कांग्रेस समेत 21 राजनीतिक दलों ने कर्जमाफी और गारंटीशुदा लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से संबंधित विधेयक पर समर्थन के लिए एक संकल्प पत्र पत्र हस्ताक्षर किए।हालांकि एक बार में ही पूरी कर्जमाफी के बजाय कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में मात्र दो लाख रुपये की कर्जमाफी का वायदा किया। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्रियों ने सरकार में आने के तुरंत बाद 31 मार्च, 2018 तक के अधिकतम दो लाख रुपये के ऋण माफ करने की तुरंत घोषणा की। यह कर्जमाफी निश्चित रूप से विधेयकों की भावना के अनुरूप नहीं है, जिसका मकसद यह है कि कर्जमाफी कृषि को लाभदायक बनाने के लिए अग्रदूत बने। यह कर्जमाफी यूपीए सरकार के दौरान 2008-09 में की गई कर्जमाफी की तर्ज पर ही प्रतीत होती है, जिसमें डिफॉल्टरों को फायदा हुआ था। उस योजना में सावधि ऋण भी शामिल थे। बीते 17 दिसंबर को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जारी आदेश से अगर कोई संकेत मिलता है, तो वह यह कि इसमें न केवल बैंक अधिकारी गड़बड़ी करेंगे, बल्कि यह उन किसानों को भी विचलित करेगा, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में उधार लेकर ऋण चुका दिया है और भविष्य में किस्तों का भुगतान न करने के लिए एकमुश्त ऋण जमा कर दिया है।

31 मार्च तक लिए गए ऋण को 30 सितंबर तक नवीनीकृत करना चाहिए, ताकि किसान रब्बी फसल के लिए ताजा ऋण ले सकें। आम तौर पर 90 फीसदी या उससे अधिक किसान कर्जदाताओं या किसी अन्य स्रोत से कुछ दिनों के लिए कर्ज लेते हैं, और बढ़ी सीमा के साथ ताजा कर्ज लेने की पात्रता के लिए उसे लौटा देते हैं। इन दिनों बैंकों ने बिना किसानों की सहमति के ऋणों को नवीनीकृत करने की एक अभिनव योजना शुरू की है। एक तरफ कर्ज की प्रवृष्टि को संदेहास्पद खाते या किसी अन्य खाते में डाल दिया जाता है और किसानों से दो फीसदी अतिरिक्त शुल्क वसूल किया जाता है, दूसरी तरफ किसानों की ऋण सीमा बढ़ा दी जाती है, जिससे उन्हें निर्वाह के लिए कुछ पैसे मिलते हैं। ऐसी परिस्थितियों में अगर किसानों ने 31 मार्च, 2018 तक लिए गए ऋण चुका दिए हैं, तो उन्हें कर्जमाफी योजना से बाहर करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा और यह निश्चित रूप से किसानों को सशक्त बनाने के एआईकेएससीसी के एजेंडे की भावना के खिलाफ होगा। इसका एक ही उपाय है कि 31 मार्च, 2018 तक कर्ज लेने वाले प्रत्येक किसानों के खाते में अधिकतम दो लाख रुपये जमा करा दिए जाएं।

एमएसपी बढ़ाए बिना या एमएसपी सुनिश्चित किए बिना कर्जमाफी से भविष्य में केवल कर्ज का ढेर ही जमा होगा। किसानों की मुश्किलों को खत्म करने के लिए इन दोनों काम को एक साथ करना चाहिए। ये दोनों मांगें एक साथ जुड़ी हुई हैं। इसलिए एआईकेएससीसी चाहती है कि ये दोनों मांगें एक ही समय में पूरी की जाएं। एआईकेएससीसी दो केंद्रीय कानूनों के माध्यम से इन दोनों को सभी किसानों का वैधानिक अधिकार बनाना चाहती है।

पहले बिल में स्पष्ट कहा गया है कि यह एकबारगी कर्जमाफी है और इससे उन सभी किसानों को फायदा होगा, जिन्होंने ऋण चुकाया है या जो कर्ज नहीं चुका पाए हैं। दूसरा बिल स्वामीनाथन रिपोर्ट के मुताबिक एमएसपी निर्धारण सुनिश्चित करता है, यानी उत्पादन लागत का डेढ़ गुना। विधेयक यह भी गारंटी देता है कि कोई भी व्यक्ति एमएसपी से कम कीमत पर उत्पाद नहीं खरीद सकता है और अगर कोई ऐसा करता है, तो उसे हो सकती है और उसे जुर्माने के रूप में भुगतान की गई राशि और एमएसपी के अंतर की दोगुना राशि भी किसानों को चुकानी होगी। किसानी को पटरी पर लाने का यही एकमात्र उपाय है। अगली पीढ़ी को खेती को जारी रखने में दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि खेती घाटे का सौदा बन गई है।

यह राष्ट्रीय चिंता का विषय है, इसलिए सभी दलों को (चाहे एनडीए हो, यूपीए हो या कोई अन्य) संयुक्त रूप से संसद का विशेष सत्र बुलाकर इन बिलों को पारित करके किसानों की मदद करने के लिए आगे आना चाहिए। हां, वर्तमान परिदृश्य में कृषि संकट पर चर्चा करने के लिए संसद का विशेष सत्र ही एकमात्र उपाय है। पिछले सत्र में सदन में अव्यवस्था के कारण अविश्वास प्रस्ताव को भी स्वीकार नहीं किया गया और इस सत्र में अब तक कोई कामकाज नहीं हुआ है। अगर इस देश में जीएसटी के लिए मध्यरात्रि में विशेष सत्र का आयोजन हो सकता है, तो देश के किसानों के लिए क्यों नहीं। जिन्होंने देश को खिलाने के लिए अपने जीवन का त्याग किया है, वे भी बेहतर जीवन के हकदार हैं। ये विधेयक यह सुनिश्चित करते हैं कि एक बार जब किसानों का कर्ज खत्म हो जाए, और किसानों को उनके उत्पादन लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दिया जाए, तो वे फिर से कोई कर्ज नहीं लेंगे। अगली पीढ़ी को आजीविका देने के लिए लंबा रास्ता तय करना होगा, जो रोजगार के अभाव और कृषि के घाटे का सौदा बनने के चलते भ्रमित हैं और अवसाद में जा रहे हैं, या मादक पदार्थों का सेवन करने लगे हैं।

-लेखक एआईकेएससीसी के संयोजक हैं।  

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