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एक नरसंहार के पचास वर्ष


एक नरसंहार के पचास वर्ष

सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 20 Dec 2018 06:45 PM IST

सुभाषिनी सहगल अली
पच्चीस दिसंबर क्रिसमस डे खुशियों के दिन के रूप में दुनिया भर में मनाया जाता है। पर पचास वर्ष पूर्व 25 दिसंबर, 1968 का दिन तमिलनाडु के तंजावुर जिले के एक छोटे से गांव कीलवेनमनी बहुत ही भयानक त्रासदी का दिन था। आज भी उस दिन की याद लोगों के रोंगटे खड़ी कर देती है। कीलवेनमनी के लिए में बड़े जमींदारों का बोलबाला था। उनकी जमीन पर दलित महिला और पुरुष काम करते थे। उनके पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं था और उन्होंने कभी पेट भर खाकर सो जाने का सुख सपनों में भी नहीं पाया था। इस गांव के कुछ गरीब कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव में आए और फिर गांव के तमाम गरीबों ने गांव में लाल झंडा गाड़ दिया। उनकी कोई बड़ी मांग भी नहीं थी। दिन भर खेतों पर मजदूरी करने के बाद उन्हें चार मुट्ठी भर अनाज मिलता था। उनकी मांग थी कि पांच मुट्ठी मिले। लेकिन यह भी जमींदारों को मंजूर नहीं था। उनको तो इस बात का क्रोध था कि उनके गुलामों ने उनके सामने सर उठाकर मांग करने की जुर्रत ही कैसे की। उन्होंने मजदूरों से कह दिया – लाल झंडा हटा दो, वर्ना तुम्हारी खैर नहीं। यही नहीं, दो ग्रामीणों को उन्होंने ‘गायब’ भी कर दिया। उनकी लाशें कई दिनों बाद मिलीं।लेकिन गांव वालों ने अपने झंडे को छोड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन पर हमला हुआ। जमींदारों के लठैतों के साथ पुलिस भी आई। जमींदारों ने खुद भी जबर्दस्त भूमिका अपनाई। जहां कोई मिला, उसे मार-मार के अधमरा कर दिया। कई तो खेतों में भागकर छिप गए। 42 गरीब मजदूरों ने एक झोपड़ी में शरण ली, उसे अंदर से बंद कर दिया। उनमें से एक के पास एक छोटा बच्चा भी था। इनमें कितने पुरुष थे और कितनी महिलाएं, आज तक पता नहीं लग पाया है। 42 के 42 जिंदा जला दिए गए थे। उनकी शारीरिक स्थिति का बयान पोस्टमार्टम की रिपोर्ट करती है। उनमें एक भी पांच फुट से अधिक लंबा नहीं थी/था। एक शव तो तीन फुट का ही था। सदियों के कुपोषण का असर ये जली हुई लाशें बयान कर रही थीं। 42 दलित मजदूर और एक छोटा दलित बच्चा जलाकर मार डाले गए, लेकिन एक भी जमींदार को सजा नहीं हुई।

अदालत में मजिस्ट्रेट ने कहा कि जमींदारों ने झोंपड़ियों में आग लगाई थी, लेकिन किसी को भी फांसी की सजा नहीं सुनाई गई। कुछ ही समय में जमींदार जमानत पर छूट गए और उच्च न्यायालय चले गए। उच्च न्यायालय का फैसला तो और भी आश्चर्यजनक था। आरोपियों की प्रतिष्ठा और धन-दौलत के बखान के बाद यह कहा गया कि हालांकि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि 42 लोग एक झोपड़ी में जलकर मर गए, पर यह नहीं कहा जा सकता है कि उनकी जान लेने के लिए उस झोपड़ी में आग लगाई गई थी। सारे आरोपियों को बरी कर दिया गया।

लेकिन एससी/एसटी अत्याचार विरोधी कानून बहुत सख्त है। उसको निरर्थक बनाने की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई कोशिश, इसके खिलाफ चार अप्रैल का बंद और, फिर, सरकार द्वारा उसकी बहाली – इन सबको लेकर कितना हंगामा हुआ। चुनाव अभियान के दौरान, मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह चुनावी मुद्दा भी बना। किसी ने यह नहीं पूछा कि बंद में शामिल लोग आज तक क्यों बंद हैं? उन पर इतने संगीन आरोप क्यों लगाए गए हैं? और बंद के दिन, दलितों पर गोली चलाने वाले आज तक क्यों आजाद घूम रहे हैं? कीलवेनमनी के भयानक नरसंहार को 50 साल हो गए। हम और हमारा समाज इन 50 वर्षों में कितना बदला है? एक हफ्ता पहले ही, उत्तर प्रदेश के एटा में एक दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारकर पीटा गया। फिर उसे पैदल ही बारात के साथ जाने की अनुमति दी गई।

कीलवेनमनी से एटा तक, 1968 से 2018 तक बहुत कुछ नहीं बदला।

  - माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य

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