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'दिन-रात खटते हैं फिर लोग पूछते हैं काम क्या करती हो’



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क्या आप ऐसी नौकरी करना पसंद करेंगे जिसमें रोज 16-17 घंटे काम करना हो, हफ़्ते में किसी दिन छुट्टी न मिले, कोई सैलरी न मिले और इन सबके बाद कहा जाए कि तुम काम क्या करते हो? दिन भर सोते तो रहते हो!

असल में देश का एक बड़ा तबका ऐसी ही नौकरी कर रहा है. ये नौकरी करने वाली औरतें हैं. वो औरतें जिन्हें हम हाउसवाइफ़, होममेकर या गृहिणी कहते हैं.

गृहिणियों के काम को लेकर एक बार फिर चर्चा छिड़ी जब कुछ दिनों पहले कर्नाटक हाइकोर्ट ने एक मामले में अपना फ़ैसला सुनाया.

हुआ ये था कि एक दंपती के बीच तलाक़ का मामला चल रहा था और पत्नी को अदालत में पेश होने के लिए मुज़फ़्फ़रनगर से बेंगलुरु आना था.

वो फ़्लाइट से आना चाहती थी लेकिन पति चाहता था कि वो ट्रेन से आए क्योंकि वो हाउसवाइफ़ है और उसके पास 'बहुत खाली वक़्त' है.


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'सातों दिन एक जैसे'

हालांकि जस्टिस राघवेंद्र एस चौहान पति की दलील से सहमत नहीं हुए और उन्होंने कहा कि एक हाउसवाइफ़ भी उतनी ही व्यस्त होती है जितना बाहर जाकर नौकरी करने वाला कोई शख़्स.

ये सारा मामला सुनकर दिल्ली में रहने वाली काजल पूछती हैं, "अगर कोई मर्द ऑफ़िस से आता है तो हम उसके लिए चाय-पानी लेकर तैयार रहते हैं लेकिन हम दिन भर काम करते हैं तो हमारे लिए कोई ऐसे नहीं करता. क्यों?"

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तीन साल की बच्ची को गोद में लिए बैठी नेहा कहती हैं, "घर में सबसे पहले सोकर हम औरतें उठती हैं, सबसे देर में बिस्तर पर भी हम ही जाते हैं और फिर सुनने को मिलता है कि हमारे पास काम क्या है!"

चार बच्चों की मां सुनीता जब अपने काम गिनाना शुरू करती हैं तो ये लिस्ट जैसे ख़त्म होने का नाम नहीं लेती.

गुलाबी लिबास पहने श्वेता फीकी हंसी हंसते हुए कहती हैं, "ऑफ़िस में काम करने वालों को तो हफ़्ते में एक-दो दिन छुट्टी भी मिल जाती है. हमारा तो मंडे टू संडे, सातों दिन एक से होते हैं."

क्या कहते हैं पुरुष?

दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले सागर मानते हैं कि काम तो किसी के पास कम नहीं है. घर के काम की अपनी चुनौतियां हैं और बाहर के काम की अपनी.

वो कहते हैं ''ये कहना ग़लत होगा कि घर पर औरतों के पास काम नहीं होता. हमें तो छुट्टी मिल भी जाती है लेकिन उनको तो हमेशा मुस्तैद रहना पड़ता है. कभी बड़ों की ज़िम्मेदारी...कभी बच्चों की और पति तो है ही. आदमी तो अपनी ज़िम्मेदारी औरत पर डाल देता है लेकिन औरत किसी से नहीं कह पाती. बहुत मुश्किल है हाउसवाइफ़ होना.''

दिल्ली के ही चंदन का मानना है कि घर संभालना बहुत मुश्किल काम है. वो कहते हैं ''ऐसी औरतें काम पर भले न जाती हों लेकिन उनके बिना आप भी काम पर नहीं जा पाएंगे. नाश्ता तो वही देती हैं...फिर साफ-सुथरे, प्रेस किए कपड़े मिल जाते हैं. ये सब हाथों-हाथ नहीं मिले तो दुनिया के आधे मर्द नौकरी पर ही न जा पाएं. जाएं तो रोज़ लेट ही पहुंचे.''


ज़मीनी सच्चाई

अभी कुछ वक़्त पहले मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में भारत की मानुषी छिल्लर से पूछा गया था कि दुनिया के किस प्रोफ़ेशन को सबसे ज़्यादा सैलरी मिलनी चाहिए थी.

उन्होंने जवाब दिया था- मां को. कहने की ज़रूरत नहीं है भारत में मांओं की एक बड़ी संख्या गृहणी का काम करती है. यानी वो काम जिसे शायद काम की तरह देखा भी नहीं जाता.

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मानुषी के इस जवाब की ख़ूब चर्चा हुई थी और इसके बाद उन्होंने प्रतियोगिता जीतकर विश्वसुंदरी का ताज अपने सिर पर पहना.

घर संभालने वाले महिलाओं की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि मानुषी का जवाब ज़मीनी हक़ीकत के काफी क़रीब था.


रिसर्च

ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट की एक रिसर्च में भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका जैसे 26 देशों का अध्ययन किया गया.

रिसर्च में पाया गया कि इन देशों की महिलाएँ रोज औसतन साढ़े चार घंटे बिना किसी पैसे के काम करती हैं.

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55 साल की सुशीला जब नई-नई दुल्हन बनकर ससुराल आई थीं तो घर में इतना काम होता था कि उन्हें खाने-पीने तक का होश नहीं रहता था.

वो कहती हैं, "सुबह उठकर गोबर थापना, गाय-भैंसों को चारा-पानी देना, घर के बच्चों को स्कूल भेजना, मर्दों को टिफ़िन देना, दोपहर में खाना बनाना और फिर शाम का चाय-नाश्ता बनाकर रात के खाने की तैयारी. पूरे दिन रोटी खाने का टाइम ही नहीं मिलता था. रोटी भी भागते-दौड़ते खाते थे."


'हाउसवाइफ़ क्यों कहते हो'

सुशीला आगे कहती हैं, "इतना खटने के बाद घर का ख़र्च चलाने के लिए पैसे मांगो तो पहले सैकड़ों सवाल पूछे जाते हैं और फिर एक-एक पैसे का हिसाब मांगा जाता है. हम भी नौकरी करते तो अपनी मर्जी से पैसे ख़र्च करते."

मंजू को 'हाउसवाइफ़' शब्द से ही दिक्कत है.

उन्होंने कहा, "ऑफ़िस में काम करने वाले या तो दिन में काम करते हैं या रात में. हम लोग तो सुबह से लेकर रात तक काम करते रहते हैं. फिर हमें हाउसवाइफ़ क्यों कहते हो? हम तो घर की महारानी हुए."

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कुछ वक़्त पहले चेतन भगत ने भी इस बात की ओर ध्यान दिलाया था. उन्होंने औरतों से कहा था कि वो ख़ुद को हाउसवाइफ़ कहना बंद करें क्योंकि उनकी शादी घर से नहीं बल्कि एक शख़्स से हुई है.

घरवालों की सबसे बुरी बात क्या लगती है?

"हमें सोने नहीं देते. हम बिस्तर पर ठीक से लेट भी नहीं पाते कि कभी चाय की फ़रमाइश आ जाती है तो कभी किसी के एक पैर का मोजा नहीं मिलता." ये नेहा की शिकायत है.


क्या चाहती हैं ये औरतें

उमा को सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा तब आता है जब लोग उन्हें सीरियल देखने के लिए ताना मारते हैं.

वो कहती हैं, "दिन-रात काम करते हैं. थोड़ी देर सीरियल देख भी लिया तो क्या आफ़त आ गई? इसी बहाने हमारा दिल बहल जाता है तो इसमें क्या तकलीफ़ है?"

तो ये औरतें चाहती क्या हैं?

थोड़ी सी तारीफ़, थोड़ी सी इज़्जत और थोड़ा सा प्यार.

उमा, काजल, पूनम, सुनीता और नेहा एक-एक करके जवाब देती हैं.

काजल कहती हैं, "हम जो काम करते हैं वो सैलरी से कहीं ऊपर का है. आप बस इस सच को कबूल लें, इतना ही हमारे लिए काफ़ी होगा."


वैसे अगर मोटा-मोटा अनुमान लगाया जाए तो भी होममेकर्स को कम कम से कम 45-50 हज़ार रुपए महीने मिलने चाहिए.

ब्रिटन में ऑफ़िस फ़ॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स (ONS) की रिपोर्ट (2014) के मुताबिक़ अगर सिर्फ़ घरों में लॉन्ड्री (कपड़े धोने और उनके रखखाव) को गिना जाए तो इसकी क़ीमत 97 अरब से ज़्यादा होगी यानी ब्रिटेन की जीडीपी का 5.9%.

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि गृहिणियों को उनके काम के पैसे भले न मिलते हों लेकिन इन्हें आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा माना जाना चाहिए.

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