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नज़रिया: दलितों और मुसलमानों पर अलग से बात होना क्यों जरूरी?



GETTY IMAGES

पुर्तगाल, हंगरी, स्वीडन और ऑस्ट्रिया की आबादी का कुल जोड़ है- चार करोड़. भारत की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में तकरीबन इतने ही मुसलमान बसते हैं. अब सोचिए, चार करोड़ लोगों की मौजूदा लोकसभा में कोई नुमाइंदगी नहीं है.

यह अपने-आप में पर्याप्त चिंता और चर्चा की बात होनी चाहिए लेकिन भारत में मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा कहीं नहीं है.

मसलन, गुजरात में पिछले ढाई दशक से सत्ता पर काबिज भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलमान उम्मीदवार खड़ा नहीं किया जबकि राज्य में मुसलमानों की आबादी नौ प्रतिशत है.

भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति ने मुसलमानों के वोट और उनकी राजनीति को बेमानी बना दिया है.

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मुसलमानों के लिए लोकतंत्र का क्या मतलब है

लोकतांत्रिक चुनावों में मानो नया नियम बना दिया गया है कि 80 प्रतिशत का मुक़ाबला 14 प्रतिशत से होगा. ऐसी हालत में मुसलमानों के लिए लोकतंत्र का क्या मतलब है, ये गंभीरता से सोचने की बात है.

कांग्रेस के राज में मुसलमानों को जो मिला उसे भाजपा 'तुष्टीकरण' कहती है, लेकिन क्या वाक़ई देश के करोड़ों मुसलमान कांग्रेस के राज में तुष्ट हुए? उनकी मौजूदा हालत चार सालों की नहीं, दशकों की उपेक्षा और सियासी चालबाज़ियों का नतीजा है.

मगर, अहम बात ये भी है कि भाजपा ने जिस तरह का माहौल बनाया है, कांग्रेस या दूसरी पार्टियाँ भी मुसलमानों से एक ख़ास तरह की दूरी रखकर चल रही हैं, और शायद आगे भी चलेंगी.

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मुसलमानों की नुमाइंदगी

बीसियों सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक मुद्दे हैं जिनके केंद्र में मुसलमान हैं, लेकिन वे सभी मुद्दे हाशिए पर हैं, सिवाय मुसलमानों की देशभक्ति मापने के. 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के साथ सत्ता में आई बीजेपी के 'सब' में मुसलमान हों, ऐसा दिखता तो नहीं है.

आबादी के अनुपात में मुसलमानों की नुमाइंदगी सिर्फ़ राजनीति में ही नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट, सरकारी नौकरी और प्रोफ़ेशनल करियर के क्षेत्रों में भी नहीं है, इसकी तस्दीक कई अध्ययनों में हो चुकी है जिनमें 2006 की जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट सबसे जानी-मानी है.

अख़लाक़, जुनैद, पहलू ख़ान और अफ़राज़ुल जैसे कई नाम हैं जिनकी हत्या सिर्फ़ इसलिए हुई क्योंकि वे मुसलमान थे.

प्रधानमंत्री निंदा करते हैं लेकिन...

अमरीकी एजेंसी यूएस कमेटी ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि "नरेंद्र मोदी के शासनकाल में धार्मिक अल्पसंख्यकों का जीवन असुरक्षित हुआ है".

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सहारनपुर और मुज़फ़्फ़रनगर जैसे दंगों के पीड़ितों को इंसाफ़ नहीं मिला है, रिपोर्ट में लिखा है--"प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिक हिंसा की निंदा तो की है लेकिन उनकी पार्टी के लोग हिंसा भड़काने में शामिल रहे हैं."

कासगंज, औरंगाबाद, रोसड़ा, भागलपुर और आसनसोल जैसे देश के अनेक शहरों में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, इन सभी मामलों में हिंसा का एक पैटर्न था, कुछ मामलों में तो भाजपा के नेता उपद्रवियों की अगुआई कर रहे थे, इन बलवों में एक सोची-समझी रणनीति के तहत मुसलमानों की दुकानों को निशाना बनाया गया.


दलितों की हालत का जायज़ा ज़रूरी

देश में लगभग 17 करोड़ मुसलमान रहते हैं. जब पूरी दुनिया में 'इस्लामोफ़ोबिया' ज़ोर पर है, मुसलमान होने को ही गुनाह की तरह देखा-दिखाया जाने लगा है, इन हालात में करोड़ों मुसलमानों और उनके मुद्दों को संतुलित ढंग से एजेंडा पर लाने की ज़रूरत और गहरा गई है.

दलितों की राजनीतिक हालत थोड़ी अलग है क्योंकि उनके वोट हिंदुओं के अस्सी प्रतिशत वोट का एक अहम हिस्सा हैं. मुसलमानों की तरह उनके बिना सत्ता का गणित पूरा करना संभव नहीं है इसलिए उनके घर जाकर खाना खाने का करतब दिखाने वालों का सिलसिला जारी है.

दलितों को दलित कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि उनकी हालत सदियों से ऐसी रही है. आज़ादी के बाद से, संविधान के ज़रिए मिले अधिकारों की वजह से उनकी हालत में कुछ सुधार आया है लेकिन आज़ादी के इतने सालों बाद दलित अपने भविष्य को आश्वस्त हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता.


हिंदुत्व की राजनीति

जिन संवैधानिक प्रावधानों की वजह से दलितों की हालत में कुछ सुधार हुआ है, वे बचे रहेंगे या नहीं, इसे लेकर दलितों के मन में शंकाएँ हैं. एससी-एसटी उत्पीड़न विरोधी क़ानून से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला एक ऐसा ही मुद्दा है जिसका दलितों ने पुरज़ोर विरोध किया. अब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश में परिवर्तन के लिए याचिका दायर की है.

पिछले महीने दलितों के विरोध प्रदर्शन, उसमें हुई हिंसा और पुलिस का रवैया, ऐसी चीज़ें हैं जो बहुत कुछ बयान करती हैं. सवर्णों में आरक्षण को लेकर जो तनाव और रोष है वो अब अलग ढंग से सामने आ रहा है जो सरकार के लिए बड़ी दुविधा पैदा कर रहा है.

हिंदुत्व की राजनीति के प्रबल समर्थकों में ब्राह्मण और राजपूत शामिल हैं जो आरक्षण को एक आपदा की तरह देखते हैं, दलितों पर होने वाले हमले चाहे गुजरात के ऊना में हों या उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में या फिर दलित दूल्हे के घोड़ी पर बैठने को लेकर रोज़-रोज़ होने वाले बवाल, ज्यादातर मामलों में बीजेपी के यही 'प्रबल समर्थक' और दलित आमने-सामने होते हैं जिनका समर्थन भाजपा चाहती है.

दलितों पर अत्याचार पर सरकारी चुप्पी

दलितों पर सवर्णों के अत्याचार के मामले में भाजपा का नेतृत्व चुप्पी की नीति अपनाता है क्योंकि वह किसी एक का साथ देते हुए नहीं दिख सकता, मगर 'आक्रामक हिंदुत्व के सिपाहियों' को यही संदेश मिला है कि सरकार उनके साथ है.

ढूँढने पर एक भी मिसाल नहीं मिलती जब दलितों पर हमले करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की गई हो, उन्हें कड़ी निंदा भी नहीं झेलनी पड़ी. याद कीजिए, ऊना की घटना के लंबे समय बाद पीएम मोदी ने बस इतना ही कहा था, "दलितों को नहीं, मुझे मारिए."

दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी दलितों के ख़िलाफ़ पुलिस की सख़्ती, उनके प्रमुख नेता चंद्रशेखर आज़ाद रावण पर रासुका लगाकर जेल में बंद रखना और दलित उत्पीड़न के मामलों में दोषियों को बचाने की कोशिश, मसलन, भीमा कोरेगाँव की हिंसा के अभियुक्तों की लंबे समय तक गिरफ़्तारी न होना, इनसे दलितों की आशंकाएँ गहरी हो गई हैं.

कभी संविधान में बदलाव की बात करते अनंत कुमार हेगड़े, तो कभी आरक्षण ख़त्म करने की बात करने वाले सीपी ठाकुर, इन सबकी वजह से दलित समाज में बेचैनी है. भारत की आबादी में दलितों की संख्या 2011 की जनगणना के मुताबिक़, करीब 20 करोड़ है, ज़ाहिर है, उनकी मौजूदा हालत की संतुलित समीक्षा दरकार है.

Complete story https://www.bbc.com/hindi/india-44210473


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