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पत्रकारिता अपने श्रेष्ठ अर्थों में नागरिक चौकसी है


सत्याग्रह कभी-कभार पत्रकारिता अपने श्रेष्ठ अर्थों में नागरिक चौकसी है लेकिन आज राजनीति की लगभग अनुचर बन गई पत्रकारिता में न तो विचार की जगह बची है, न समाजनीति की अशोक वाजपेयी


चर्चित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद एक विरोध प्रदर्शन | रॉयटर्स हिंदी में पत्रकारिता के इस अभागे विचार-शून्‍यदौर में राजकिशोर का असमय देहावसान सामान्य अर्थ में क्षति नहीं है. वे उन बिरले पत्रकारों में से थे, जिनका साहित्य से गहरा संबंध था और विचार से भी. जो तत्व इधर पत्रकारिता से लगातार गायब हो रहे हैं उनमें निर्भीकता, विश्लेषण का धीरज और साफ-सुथरा गद्य है. राजकिशोर तीनों में धनी थे. उनके यहां भाषा में संवेदना की छटा गुंथी हुई थी. वे गहरा प्रहार करते थे लेकिन आक्रामक नहीं, सौम्‍य थे. उन्हें कई अर्थों में सौम्‍य पर प्रखर, अनुग्र पर सजग नागरिकता का पत्रकार कहा जा सकता है. पत्रकारिता अपने श्रेष्ठ अर्थों में नागरिक चौकसी है. अपने समय में पूरी मुस्तैदी और तैयारी से, कई रतजगे सहकर राजकिशोर ने यह चौकसी बखूबी की. आज की पत्रकारिता राजनीति से बेहद आक्रांत है. राजनीति की लगभग अनुचर बन गई पत्रकारिता में न तो विचार की जगह बची है, न समाजनीति की. राजकिशोर की पत्रकारिता में राजनीति पर आग्रह कम समाजनीति पर अधिक था. इसीलिए उन्होंने स्त्रियों, दलितों, अन्याय के शिकार अन्य वंचितों को लेकर विपुल लेखन किया. यह लेखन एक स्तर पर पत्रकारिता है और दूसरे स्तर पर साहित्य. वे थोड़े से पत्रकारों में से एक रहे जिनको साहित्य में गंभीरता से लिया जाता था. राजकिशोर लोहिया, गांधी, आंबेडकर आदि में से किस से कम, किससे अधिक प्रभावित थे इस पर बहस की जा सकती है. लेकिन उन्हें किसी वैचारिक संकीर्णता में बांधा नहीं जा सकता. वे स्वतंत्र विवेक और न्याय सम्‍मत विचार के पक्षधर थे. स्वतंत्रता, समानता और न्याय की जो लोकतांत्रिक मूल्यत्रयी भारतीय संविधान का आधार है, उसे राजकिशोर ने एक सेनानी की तरह सदा अपने ध्यान में रखा. उनके लिए वैचारिक संघर्ष किया और कई कष्ट भी सहे, पर कभी समझौता नहीं किया. उनके लिए जो स्मृतिसभा प्रेस क्लब दिल्ली में आयोजित हुई उसमें अनेक वक्ताओं ने इस पर भी बल दिया कि एक ऐसे समय में जब ऐसा माहौल है कि असहमति की जगह लगातार घट रही है तब राजकिशोर अपने व्यवहार और लेखन में असहमति का बिला चूक सम्मान करते थे. उन्हें हम जैसे कइयों की तरह यारबाशी की लत थी या नहीं पर कई तरह से यह स्पष्ट हुआ कि उनका संवाद में गहरा विश्वास था. ज़ाहिर है यह भी उनकी लोकतंत्र में गहरी आस्था की ही अभिव्यक्ति था. इसी संवादप्रियता ने उनके लेखन को साफ़-सुथरा और संप्रेषणीय बनाया. यह संप्रेषण किसी वैचारिक सरलीकरण या सतहीकरण में अर्जित नहीं किया गया था. उसमें विचारों की सघनता भी थी और प्रमाण था कि पत्रकारिता में विचारों को बिना उन्हें बोझिल बनाये गूंथा जा सकता है. युद्ध-स्‍मृति प्रेम, प्रकृति, मृत्यु के साथ-साथ युद्ध भी कविता और साहित्य के स्थायी आकर्षणों में रहा है. राम-रावण युद्ध, महाभारत हमारी स्मृति में बार-बार रूपक की तरह उभरते हैं और स्मृति के भयावह क्षरण के बावजूद हम अपना स्वतंत्रता-संग्राम, भारत-चीन और भारत-पाक युद्ध याद करते रहते हैं. 1914 का पहला विश्व युद्ध एक ऐसा युद्ध था, जिसमें लगभग सारा यूरोप शामिल था और इसका गहरा प्रभाव यूरोपीय साहित्य पर भी पड़ा. अंग्रेजी में उस दौरान बहुत सारी कविताएं लिखी गयीं. उस दौर की कविताओं में कई संचयन निकले हैं. हाल ही में फ़ेबर एंड फ़ेबरसे केराल एन डफ़ी ने ‘1914 पोएट्री रेमेम्बर्स’ नाम से एक नया संचयन निकाला है. जिसमें इस समय के अनेक ब्रिटिश कवियों ने उस युद्ध के बारे में तब लिखी गई एक-एक कविता चुनी है और स्वयं एक नई कविता लिखी है. उस युद्ध में साढ़े छ: करोड़ नागरिक प्रभावित हुए थे. एक करोड़ लोग मारे गए थे और दो करोड़ घायल हुए थे. यह तब तक के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार था. उसके बारे में एक मार्मिक प्रश्‍न एक कवि ने पूछा, ‘कोई जानता है कि वह सब किस बारे में था?’ एक नई कविता का समापन होता है इन पंक्तियों से ,‘खामोशी जो छा जाती है युद्धक्षेत्र और कुम्हार के खेत में/ और वही है जो बाकी रह जाती है उसके सच की और जिसे छोड़ देना चाहिए अनकहा.’ घायल अंगों पर लगाई जाने वाली सफ़ेद पट्टियों के बारे में एक और कवि कहता है, ‘हम समय पार गवाह हैं/कैसे सारे लोगों का खून एक जैसा होता है/और फिर भी हम लिखते हैं तकलीफ़ से/हम जो घावों को उम्मीद से ब्याहते हैं.’ हर युद्ध जिन लक्ष्यों के लिए शुरू होता है और उन्हें देर-सवेर भूल जाता है और लड़ना और नष्ट करना एक मात्र लक्ष्य बच जाता है. कवि सीफ्रीडसैसून ने सेना में रहते हुए 1917 में एक वक्तव्य अपने वरिष्ठ अधिकारी को दिया था. जिसकी शुरुआत हुई थी इन शब्दों से ,‘मैं यह वक्तव्य जानबूझकर की गई सैन्य अथॉरिटी की अवज्ञा के रूप में दे रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है कि इस युद्ध को जानबूझकर खींचा जा रहा है उनके द्वारा जो उसे खत्म करने की शक्ति रखते हैं’ यह वक्तव्य कवि ने अपने कमांडिंग अफ़सर को भेजा था और सेना में आगे काम करने से इंकार कर दिया था. शार्लोट म्‍यू की मई, 1915 कविता की शुरुआत होती है ,‘हम याद रखें कि बसंत फिर आएगा/ जले काले पड़ गए वनों में/ जहां घायल वृक्ष पुराने सयाने धीरज के साथ/ स्वर्गिक वर्षा की प्रतीक्षा करते हैं।’ रूथ पाडेल का एक शब्द-समुच्‍चय है ,‘पक्षियों की भाषा/जो मानवीय धरती का अनुवाद करती है/अमूर्त और दैविक में.’ दलजीत नागरा कहते हैं ,‘हमारे गीत ताजे हैं हल-बैल के साथ,/खुली आग की गंध से जहां रोटी चटख रही है/और हमारे गुलाब घर के गुलाब हैं.’ सहगल संग्रहालय आमतौर पर भारत में किसी कलाकार पर एकाग्र संग्रहालय नहीं के बराबर है. संग्रहालय जाने की भारतीयों में न तो आदत है, न शौक. भारत में जो 400 से अधिक संग्रहालय हैं जिनमें से अधिकांश में प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक अनेक अमूल्य और अद्भुत कलाकृतियां संग्रहीत और प्रदर्शित हैं, उनमें जाने वाले भारतीयों की संख्या दयनीय रूप से कम है. इन्‍हीं में से कई भारतीय जब विदेश में पर्यटन पर जाते हैं तो वहां संग्रहालय में जाना नहीं भूलते. ऐसी संग्रहालय-विमुखता के माहौल में दिल्ली के जंगपुरा एक्सटेंशन में आधुनिक शिल्पकार अमरनाथ सहगल के निजी स्थान को एक संग्रहालय का रूप दे दिया गया है और अगले कुछ महीनों में उसका शुभारंभ होने जा रहा है. जगह वही है जहां 1922 में जन्मे और 2007 में दिवंगत का निजी स्टूडियो था. कई दशकों पहले एक बार अमरनाथ सहगल के निमंत्रण पर एक शाम उनके स्टूडियो में बिताई थी. वे दुनिया के अनेक देशों का भ्रमण कर चुके थे और उन पहले भारतीय कलाकारों में से थे, जिनकी कलाकृतियां अनेक देशों में सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित हैंं. लक्‍समबर्ग में तो उनका एक निजी स्टूडियो भी था जहां वे कई महीने काम करते बिताते थे. वहीं एक बैंक ने उन्हें बहुत सारा शुद्ध सोना दिया था, जिसमें उन्होंने अनेक शिल्प बनाए थे. कलाकार के बेटे राजन सहगल ने संग्रहालय बनाया है जो बहुत सुरुचिपूर्ण और सुकल्पित है. उसमें उनकी अनेक कलाकृतियों के अलावा, उनकी फोटो, पत्र, पोस्‍टर, कविताएं, समीक्षा आदि बहुत जतन से प्रदर्शित है. अमरनाथ सहगल की लंबी कलायात्रा का एक पूरा नक्शा आपके सामने है. ऐसा प्रस्ताव है कि संग्राहक नियमित रूप से कुछ गतिविधियां भी आयोजित करे ताकि इस आत्‍मीय और स्‍पंदित स्‍पेस को जीवंत किया जा सके. संग्राहक श्रुति इज़ाक इस दिशा में सोच रही हैं, सक्रिय हो रही हैं. शोध और विश्लेषण के लिए संग्रहालय में पर्याप्त सामग्री और सुविधा है. यह संग्रहालय देखकर मेरे मन में यह भाव बहुत शिद्दत से उठा कि क्या हुसैन, राजकुमार, कृष्‍ण खन्ना आदि के परिवार-जन अपने महान पिताओं की स्मृति संरक्षित करने के लिए उनके निवासों को ऐसे संग्रहालयों में नहीं बदल सकते? संयोगवश इन सभी के निवास एक समय इसी जगह के आस-पास थे. अगर दिल्ली सरकार को कुछ समझ इस क्षेत्र की हो तो वह एक व्यापक परियोजना बनाकर ऐसे काम में पहल भी कर सकती है और मदद भी. हमें अपने मूर्धन्य कलाकारों के उत्तरजीवन की रक्षा करना सीखना चाहिए. वे हमें याद दिलाते हैं और बताते हैं कि कलाकार कितनी कठिनाइयों और अड़ंगों से जूझ कर कलाकृतियां बनाते हैं और अन्‍तत: अपने को कालजयी बनाने में सफल होते हैं, भयावह विषमताओं के बावजूद. उन्हें सुरक्षित रखना हमारा सहज सामाजिक और सांस्कृतिक कर्तव्य है. आप अपनी राय हमें इस लिंक या mailus@satyagrah.com के जरिये भेज सकते हैं.


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